बुलंदशहर/सिकंदराबाद। सिकंदराबाद क्षेत्र के हृदयपुर गांव में राष्ट्रीय देहात मोर्चा द्वारा “भूमि अधिग्रहण से उजड़ते गांव और जहरीली हवाएं” विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी में किसानों, ग्रामीणों और खेतीहर मजदूरों के अधिकारों, भूमि अधिग्रहण, बढ़ते प्रदूषण तथा गांवों की पहचान समाप्त होने जैसे मुद्दों पर वक्ताओं ने गंभीर चिंता जताई।

गोष्ठी के दौरान “जमीन हमारी, शहर हमारा तो शहर में वाजिब हिस्सा भी हमारा हो और जो जमीन पर नहीं, जोत पर जिंदा था उसका हिस्सा सबसे पहले हो” का नारा प्रमुखता से गूंजा।

वक्ताओं ने कहा कि विकास का अर्थ केवल टावर और बड़े-बड़े औद्योगिक क्षेत्र बनाना नहीं है। वास्तविक विकास तभी माना जाएगा, जब जिस किसान ने अपनी जमीन दी और जिस मजदूर ने उस जमीन पर वर्षों तक मेहनत की, दोनों को उस विकास में सम्मानजनक हिस्सेदारी मिले।

वक्ताओं के अनुसार, नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण पिछले लगभग 25 वर्षों में एक लाख एकड़ से अधिक भूमि का अधिग्रहण कर चुके हैं और इन प्राधिकरणों के विकास के चलते 300 से अधिक गांवों की पारंपरिक पहचान प्रभावित हुई है। उन्होंने कहा कि सरकारों की ओर से किसानों को यह भरोसा दिलाया गया था कि जमीन देने के बाद उन्हें विकसित शहरों में उचित हिस्सा मिलेगा, लेकिन शहर तो बस गए, किसान का शहर में हिस्सा आज भी दिखाई नहीं देता।

‘किसान जमीन देने के बाद न किसान रहा, न उद्योगपति’

राष्ट्रीय देहात मोर्चा के राष्ट्रीय संयोजक प्रिंसिपल मन्तराम नागर मथुरापुर ने कहा कि जिन क्षेत्रों में किसानों की जमीन पर औद्योगिक सेक्टर स्थापित हुए, वहां आसपास के गांवों में पानी और हवा के प्रदूषण की समस्या बढ़ी है। इससे ग्रामीणों का जीवन प्रभावित हुआ और कई गांव अपनी पहचान खोते चले गए।

उन्होंने कहा कि मुआवजे के रूप में मिली सीमित राशि समय के साथ समाप्त हो गई। आज स्थिति यह है कि जिन किसानों की जमीनों पर कारखाने खड़े हैं, उनके बच्चे उन्हीं कारखानों में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी के लिए भटकने को मजबूर हैं। आबादी के प्लॉट नहीं मिलने के कारण कई परिवार सीमित जगह में रहने को मजबूर हैं और गांवों की स्थिति भी बदतर होती जा रही है।

नागर ने कहा कि गलत नीतियों और प्राधिकरणों की कार्यप्रणाली के कारण किसान आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर हुआ है। पहली पीढ़ी ने खेती छोड़ी, दूसरी पीढ़ी ने मुआवजा समाप्त किया और तीसरी पीढ़ी रोजगार एवं भविष्य के संकट से जूझ रही है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय देहात मोर्चा उन लोगों की आवाज बनने का प्रयास कर रहा है, जिनके अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने ग्रामीणों से अपनी पहचान, रोजगार, जमीन, हवा, पानी और जीवन की रक्षा के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने का आह्वान किया।

प्राधिकरण बोर्ड में किसान और भूमिहीनों की भागीदारी की मांग

राष्ट्रीय महासचिव जयकुमार गुर्जर लुहारली ने कहा कि किसानों की जमीन कम कीमत पर लेकर उसी जमीन को उद्योगपतियों और बिल्डरों को ऊंची कीमतों पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

उन्होंने कहा कि प्राधिकरणों के बोर्ड में किसानों और भूमिहीनों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। ऐसे में गांव-किसान की आवाज निर्णय लेने वाली व्यवस्था तक नहीं पहुंच पाती।

उन्होंने मांग की कि जिन क्षेत्रों में स्थापित फैक्ट्रियों का प्रदूषण स्थानीय किसान और ग्रामीण झेल रहे हैं, वहां स्थानीय लोगों की रोजगार और आर्थिक हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए। साथ ही प्राधिकरणों के बोर्ड में किसान एवं भूमिहीन प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए।

उन्होंने कहा कि भूमि अधिग्रहण के कारण खेतीहर मजदूरों के सामने भी रोजगार का संकट पैदा हुआ है। जिन गांवों की जमीन पर कॉम्प्लेक्स और बड़े बाजार विकसित हो गए हैं, वहां व्यापार में बाहरी लोगों की हिस्सेदारी बढ़ रही है, जबकि स्थानीय किसान और मजदूर अपने ही क्षेत्र में रोजगार के अवसरों से वंचित दिखाई देते हैं।

अधिवक्ता ने भूमि अधिग्रहण कानून पर रखे विचार

केंद्रीय संचालन समिति के सदस्य एवं सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता विजेंद्र कसाना सकलपुरा ने भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधानों पर चर्चा की। उन्होंने 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून के स्थान पर 2013 में बनाए गए नए कानून और उसके प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण से जुड़े मामलों में सामाजिक प्रभाव आकलन, खाद्य सुरक्षा तथा बहुफसली एवं सिंचित भूमि जैसे विषयों को गंभीरता से देखा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में किसानों और ग्रामीण समुदाय के सामाजिक एवं आर्थिक हितों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

कई ग्रामीण प्रतिनिधियों ने रखे विचार

विचार गोष्ठी को नोएडा मंडल महासचिव डॉ. महेश कुमार मावी, मेरठ मंडल उपाध्यक्ष नंबरदार बेगराज नागर, हापुड़ जिला संयोजक चौधरी जगबीर सिंह, चेयरमैन वीरेंद्र सिंह भाटी जोखाबाद, मास्टर महावीर खारी, चीती प्रधान विजय सिंह हृदयपुर, कौशल अधाना और जयकुमार भाटी लुहारली सहित अन्य वक्ताओं ने संबोधित किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता चौधरी प्रताप सिंह ने की, जबकि संचालन दया प्रधान ने किया।

गोष्ठी में बाबूराम प्रमुख सांवली, कमल प्रधान, डॉ. संजय, मुनीराम, अमनदीप, वीर सिंह, ब्रह्म प्रधान, योगेंद्र एडवोकेट, भारत सिंह, सुरेंद्र अवाना, रोहित भाटी, तिलपता, रघुराज सिंह मंडावरा, जय सिंह, बलराज, वीर सिंह सहित क्षेत्र के सैकड़ों ग्रामीण मौजूद रहे।

गोष्ठी में वक्ताओं ने भूमि अधिग्रहण के बाद किसानों के पुनर्वास, रोजगार, स्थानीय हिस्सेदारी, प्रदूषण नियंत्रण और प्राधिकरणों में किसान प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया तथा ग्रामीणों के अधिकारों के लिए संगठित प्रयास करने का आह्वान किया।